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दशमूल के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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दशमूल के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

परिचय (Introduction)

लघु पंचमूल और बृहतपंचमूल दोनों को मिलाकर दशमूल बनता है।

गुण (Property)

दशमूल त्रिदोषनाशक, श्वास (दमा), खांसी, सिर दर्द, सूजन, बुखार, पसली का दर्द, अरुचि (भोजन का मन न करना) और अफारा (पेट में गैस) को दूर करता है। स्त्रियों के प्रसवकाल में यह बहुत उपयोगी है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

  1. अंडकोष की सूजन: 14 से 28 मिलीलीटर दशमूल के काढ़े को 7 से 14 मिलीलीटर एरंड के तेल में मिलाकर रोजाना सुबह सेवन करने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।

    2. दांत मजबूत करना: सरसों के तेल में दशमूल काढ़ा डालकर आग पर पकायें। गाढ़ा हो जाने पर इससे दाँत एवं मसूढ़ों पर मलने से मसूढ़े मजबूत होते हैं।

    3. गर्भवती स्त्री का बुखार: दशमूल के गर्म काढ़े में शुद्ध घी को मिलाकर सेवन करने से गर्भवती स्त्री का प्रसूत ज्वर मिट जाता है।

    4. बहरापन: दशमूल काढ़े को तेल में पकाकर ठंडा कर लें। फिर इस तेल को चम्मच में लेकर गुनगुना करके 2-2 बूंद करके दोनो कानों में डालने से बहरापन दूर होता है।

    5. कमरदर्द: 14 से 28 मिलीलीटर दशमूल काढे़ को 7-14 मिलीलीटर एरण्ड के तेल के साथ मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से कमर दर्द से आराम मिलता है।

    6. कनफेड: फिटकरी, माजूफल, पलाश, पापड़ी और मुर्दासंग को एक साथ लेकर खिरनी के रस में मिलाकर कनफेड पर लगाने से आराम आता है।

    7. जनेऊ (हर्पिस) रोग: दशमूल रस 40 से 90 ग्राम रोजाना 4 बार प्रयोग में लाने से जनेऊ रोग में लाभ मिलता है।

    8. सभी प्रकार के दर्द होने पर: दशमूल ( बेल, श्योनाक, गंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) को पकाकर काढ़ा बना लें, फिर इसमें जवाखार और सेंधानमक मिलाकर खाने से दिल के दर्द (हृदय शूल), श्वास (दमा), खाँसी, हिचकी और पेट में गैस के गोले आदि रोग समाप्त होते हैं।

    9. पेट में दर्द: दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) को पीसकर काढ़ा बनाकर गाय के पेशाब में मिलाकर पीने से पित्तोदर यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में राहत मिलती है।

    10. गठिया रोग: घुटने के दर्द में एरण्ड के तेल को दशमूल काढ़े के साथ सेवन करना चाहिए। इससे रोगी को तुरन्त फायदा मिलता है।

    11. पीलिया का रोग: दशमूल काढ़े का एक कप रस लेकर उसमें आधा चम्मच सोंठ तथा 2 चम्मच शहद मिलाकर सुबह 8-10 दिन तक सेवन करने से पीलिया का रोग दूर हो जाता है।

    12. शरीर का सुन्न पड़ जाना: दशमूल के काढ़े में पुष्कर की जड़ को मिलाकर पीने से शरीर का सुन्न होना दूर हो जाता है।

    13. सिर का दर्द: दशमूल के काढ़े में घी और सेंधानमक को मिलाकर सूंघने से सिर दर्द के अलावा आधासीसी (आधे सिर का दर्द) का दर्द भी खत्म हो जाता है।

    14. लिंगोद्रेक (लिंग उत्तेजित होने पर): 10 से 100 ग्राम दशमूल का रस दिन में 4 बार 6-6 घंटों पर सेवन करने से लिंग उत्तेजित होने का रोग दूर हो जाता है।

    15. शोथ (सूजन) का ज्वर:

    दशमूल और सोंठ का काढ़ा बनाकर पीने से सूजन के बुखार में लाभ होता है।
    शहद मिलाकर रोजाना सुबह-सुबह रोगी को पिलाने से सूजन के बुखार, प्रसूति बुखार, सन्निपात ज्वर और अनेक प्रकार के वात रोगों में लाभ होता है।

    16. सन्निपात ज्वर:

  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) के काढ़े में छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से नींद (तन्द्रा यानी अनिद्रा), खाँसी, श्वास (दमा), कण्ठ अवरोध (गले की खराबी), हृदयावरोध (दिल का रोग), पसलियों का दर्द तथा वात, पित्त और कफ दूर होता है। साथ ही साथ सन्निपात बुखार नष्ट हो जाता है।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) के काढ़े में उतना ही अदरक का रस, कायफल, पोहकरमूल, सोंठ, कालीमिर्च, काकड़ासिंगी, पीपल, जवासा तथा अजवायन आदि को मिलाकर पिलाने से सन्निपात बुखार से पीडि़त मरीज को छुटकारा मिलता है।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) और कचूर, काकड़ासिंगी, पोहकरमूल, धमासा, भांरगी, कुड़े के बीज़, पटोल के पत्ते और कुटकी आदि को मिलाकर पकाकर काढ़ा बना लें। इस बने काढ़े को पीने से त्रिदोष बुखार, खाँसी, नींद व आना, प्रलाप, दाह (जलन) और अरुचि (भूख न लगना) के रोग समाप्त हो जाते हैं।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय), त्रिकुटा, सोंठ, भारंगी और गिलोय को मिलाकर काढ़ा बना लें, इस बने काढ़े को सेवन करने से सन्निपात बुखार में लाभ होता है।
  1. वात-पित्त का बुखार: बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) और अडू़से के काढ़े में शहद मिलाकर रोगी को पिलाने से कफ के बुखार में लाभ मिलता है।

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