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वत्सनाभ के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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वत्सनाभ के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

परिचय (Introduction)

भारत में सिक्किम से लेकर उत्तर पश्चिम हिमालय तक समुद्र तल से 10,000 से 15,000 फुट की ऊंचाई तक वत्सनाभ के पौधे पाये जाते हैं। हमारे देश में इसकी 28 प्रजातियां पायी जाती हैं। वत्सनाभ विषैली तथा विषरहित दोनों तरह की होती है। वत्सनाभ के फूल बड़े आकर्षक होते हैं। इसके विषैले पौधे के फूलों को सूंघने मात्र से ही मनुष्य मूर्छित (बेहोश) हो जाता है। सबसे अधिक विष वत्सनाभ की श्रृंगाकार जड़ों में होता है, जिनका औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। बाजारों में दो तरह के वत्सनाभ मिलते हैं, एक काला, दूसरा सफेद। वास्तव में वात्सनाभ का प्राकृतिक रंग धूसर, पीताभ होता है जिसे सफेद बछनाग कहते हैं। वत्सनाभ को रंगकर काला बछनाग बनाया जाता है, इससे इसमें कीड़े नहीं लगते हैं। वत्सनाभ की आकृति बछड़े की नाभि के समान होती है और इसके आस-पास अन्य पेड़ उत्पन्न नहीं होते हैं।

गुण (Property)

विधिपूर्वक शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ विषनाशक, त्रिदोषनाशक तथा वीर्यवर्धक है।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

वत्सनाभ ज्यादा मात्रा में लेने से मनुष्य की मृत्यु भी हो सकती है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

खांसी और श्वास :
ताम्बुल के पत्ते पर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग बच्छनाग (वत्सनाभ) डालें तथा पकाये हुए अलसी के तेल को इसमें चुपड़कर रख लें। इसे सुबह-शाम खिलाने से खांसी और दमा में आराम होता है।

टांसिल :
वत्सनाभ को पीसकर गले में लेप करने से टांसिल इत्यादि गले के रोगों में बहुत लाभदायक होता है।

बुखार :
गंधक, सोहागा, दालचीनी और दूसरी चटपटी सुगंधित चीजों के साथ, वत्सनाभ आधे चावल के बराबर की मात्रा में देने से बार-बार आने वाला बुखार ठीक हो जाता है।
बछनाग को थोड़ी मात्रा में देने से न्यूमोनिया (ठंड लगकर बुखार का आना) में राहत मिलती है।
शुद्ध सुहागा, शुद्ध हींग, शुद्ध किया बछनाग, नागदंती, निर्गुण्डी का रस इन सब चीजों को समान भाग लें और इच्छी तरह से पीसकर 65-65 मिलीग्राम की गोलियां बना लें। इन गोलियों में से 1-1 गोली रोजाना सुबह-शाम लेने से घाव, सूजन और बुखार में बहुत लाभ होता है।
कपूर, कुनैन और शुद्ध बछनाग बराबर मात्रा में लेकर 65 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम देने से अभिष्यन्द युक्त ज्वर (बुखार) खत्म होता है।

धुमेह (शूगर) :
70 ग्राम अखरोट में 10 ग्राम शुद्ध बछनाग को मिला लें, फिर उसमें से लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक की मात्रा में रोगी को 3 दिनों तक दें। इससे भयातिसार (भय के कारण दस्त लगना), मधुमेह, कुष्ठ रोग और पक्षाघात (लकवा) आदि रोग दूर हो जाते हैं।

मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन) होना :
शुद्ध बछनाग को आधे चावल भर की मात्रा में रोगी को देने से मूत्रकृच्छ समाप्त होता है।

मूत्रातिसार (पेशाब का बार-बार) आना :
जिसका मूत्र न रुकता हो उसको आधे चावल के बराबर बछनाग का सेवन करना चाहिए। साइटिका, गठिया (घुटने के दर्द), धनुर्वात (शरीर का टेढ़ा हो जाना) में भी इसको बहुत ही कम मात्रा में देने से लाभ होता है।

शरीर के सभी अंगों का दर्द :
वत्सनाभ का तेल सभी प्रकार के दर्द खत्म करता है। इसका लेप गठिया और छोटे जोड़ों की सूजन पर करने से लाभ होता है।
25 ग्राम बछनाग को अलसी के तेल में पकाकर रख लें। इस तेल की मालिश करने से हर तरह की गठिया और सभी प्रकार के दर्द नष्ट होते हैं।

नाड़ी कमजोरी :
नाड़ी कमजोरी में वत्सनाभ लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से नाड़ी की गति सामान्य हो जाती है तथा नाड़ी कमजोरी के कारण उत्पन्न, बहूमूत्र (पेशाब का बार-बार आना), शय्यामूत्र (बिस्तर पर पेशाब करना) आदि विकारों को भी यह दूर करता है।

सेक्स पावर :
बछनाग में सुहागा मिलाकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से मनुष्य की आयु लम्बी, तेजवान और जोशीला होता है और उसकी हृदय की गति व्यवस्थित रहती है। इसके सेवन से कामशक्ति बनी रहती है और ज्ञानेन्द्रियां पावरफुल हो जाती हैं। वत्सनाभ बुखार, मंदाग्नि, गठिया, फोड़े-फुन्सी आदि बीमारियों से भी बचाती रहती है।
काली हरड़ और चित्रक 30-30 ग्राम, पीपल 15 ग्राम और बछनाग सफेद 9 ग्राम, इस सबको पीसकर गाय के घी में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। इस मिश्रण में शहद मिलाकर 2.5 ग्राम से 3 ग्राम तक की मात्रा देने से श्वेत कुष्ठ, दमा आदि रोगों में लाभकारी होता है और मनुष्य की सभी अंगों की शक्तियां बढ़ती हैं। ध्यान रहे : इसका प्रयोग करने से पहले कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पेट साफ कर लेना चाहिए।

सूजन :
सूजन युक्त बुखार में या कफ प्रधान नये बुखार में बछनाग को थोड़ी मात्रा में बुखार के प्रारंभ में ही दे देने से लाभ होता है। बच्चों की सूजन में बछनाग एक प्रभावशाली औषधि है।

बिच्छू का विष :
बछनाग को घिसकर बिच्छू के काटे हुए जगह पर लेप करने से और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से बिच्छू का विष उत्तर जाता है।

कुष्ठ :
वत्सनाभ का प्रयोग 3 महीने तक करने से कुष्ठ रोग समूल खत्म हो जाता है।

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