रतालू के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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परिचय (Introduction)

रतालू का उत्पादन पूरे भारत में किया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होती है। यह जमीन में पैदा होने वाला कन्द है। इसकी किस्मों में मूल, कन्द और रंग की दृष्टि से काफी अंतर रहता है। इसकी कुछ किस्मों का रंग पीला व सफेद होता है। जामुनी रंग वाली किस्में दक्षिण भारत अधिक मात्रा में मिलती हैं। सफेद रतालू को `गराड़´ कहते हैं। छिलने पर यह सफेद दिखता है। ये लंबे और गोल किस्म के होते हैं। गराड़ की तुलना में लाल रतालू ज्यादा मीठा और स्वादिष्ट होता है, इसका मूल्य ज्यादा होता है। रतालू को छीलकर सब्जी बनायी जाती है। इससे पूड़ी-पकौड़े और खीर आदि भी बनाई जाती है। व्रत (उपवास) के दौरान फलाहार के रूप में भी रतालू का उपयोग होता है। रतालू को उबालकर, सुखाकर बनाया हुआ आटा अन्य किसी भी आटे में मिलाया जा सकता है। रतालू की बेल के पत्तों की सब्जी बनती है। साग बनाने से पहले पत्तों को तवे पर सेंक लेना चाहिए। यह शक्तिदायक, चिकना, कफ को दूर करने वाला, भारी (गरिष्ठ) और मल को रोकने वाला होता है। तेल में तलने पर यह ज्यादा ही मुलायम (कोमल) और स्वादिष्ट (रुचिप्रद) बन जाता है। लाल रतालू-मीठा (मधुर), ठंडा (शीतल), बलवर्द्धक, भारी और पौष्टिक है। यह अधिक कार्य करने से होने वाली जलन तथा गर्मी को नष्ट करता है। “सुश्रुत´´ के अनुसार रतालू कफकारक, भारी और वायुकारक है। `वाग्भट्ट´ के अनुसार रतालू गर्म, तीखा, वायु व कफनाशक है। मेहनत करने वाले लोगों को रतालू जल्दी पचता है और अनुकूल पड़ता है। कमजोर तथा निरूद्यमी (आलसी) लोगों को यह प्रतिकूल है। सामान्यत: रतालू वायुकारक है।

गुण (Property)

यह ठंडा होता है। देर में पचता है। गर्मी के दोषों को शांत करता है, वीर्य को अत्यंत अधिक करता है। शरीर को मजबूत और शक्तिशाली बनाता है तथा मोटापा लाता है। यह कब्ज दूर करता है तथा शरीर में बादी पैदा करता है।