जटामांसी के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

1256

परिचय (Introduction)

जटामांसी हिमालय में उगने वाली एक मशहूर औषधि है। जटामांसी का पौधा होता है जिसका तना 10 से 60 सेमी तक लम्बा होता है। जटामांसी के पत्ते 15 से 20 सेमी तक लम्बे होते हैं ये गुच्छे में लगे होते हैं, इसके फूल सफेद व गुलाबी या नीले रंग के एक गुच्छे में लगते हैं। फल सफेद रोमों से भरे छोटे व गोल-गोल होते हैं। इसकी जड़ लंबी, गहरी भूरे रंग की सूत्रों युक्त होती है। जटामांसी कश्मीर, भूटान, सिक्किम और कुमाऊं जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अपने आप उगती है। इसे श्बालछड़ष के नाम से भी जाना जाता है। जटामांसी ठण्डी जलवायु में उत्पन्न होती है इसलिए यह हर जगह आसानी से नहीं मिलती। इसे जटामांसी इसलिए कहा जाता क्योंकि इसकी जड़ में बाल जैसे तन्तु लगे होते हैं। एलोपैथिक डांक्टर को इसके सारे गुण ‘वेलेरियन नामक दवा में मिलते हैं।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

जटामांसी का ज्यादा उपयोग करने से गुर्दों को हानि पहुंच सकती है और पेट में दर्द शुरू हो सकता है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

हिस्टीरिया:

4 चम्मच जटामांसी की जड़ का चूरन, 2 चम्मच वच का चूरन और एक चम्मच काला नमक मिलाकर आधा चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार रोज लें। इसे 1 हफ्ते तक खाने से रोग से मुक्ति मिलेगी।

बाल काले और लंबे करना:

जटामांसी के काढ़े से अपने बालों की मालिश कर सुबह-सुबह रोज लगायें और 2 घंटे के बाद नहा लें इसे रोज करने से फायदा पहुंचेगा।

चेहरा साफ करना:

जटामांसी की जड़ को गुलाबजल में पीसकर चेहरे पर लेप की तरह लगायें। इससे कुछ दिनों में ही चेहरा खिल उठेगा।

उच्च रक्तचाप में (हाई ब्लडप्रेशर):

जटामांसी, ब्राह्मी और अश्वगंधा का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार बराबर रूप लें।

नींद न आना:

सोने से 1 घंटा पहले 1 चम्मच जटामांसी की जड़ का चूर्ण ताजा पानी से ले। इससे नींद न आने की बीमारी दूर हो जाती है।

बवासीर:

  • जटामांसी और हल्दी बराबर की मात्रा में पीसकर मस्सों पर लगायें। इससे बवासीर नष्ट हो जाती है।
  • जटामासी के तेल को मस्सों पर लगाने से मस्सें सूख जाते हैं।

सूजन व दर्द:

जटामांसी का चूरन पानी में पीसकर लेप बनायें और सूजन पर लगायें। इससे सूजन और दर्द नष्ट हो जाती है।

दांतों का दर्द:

  • जटामांसी की जड़ का बारीक चूरन बनाकर मंजन की तरह दांतों को साफ किया जाये तो दांतों के दर्द, मसूढ़ों का दर्द, सूजन, पीव आना, मुंह की बदबू जैसे कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।
  • जटामांसी को बारीक पीसकर पाउडर (मंजन) बनाकर प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द दूर हो जाता है।

पेट में दर्द:

  • जटामांसी 200 ग्राम, 200 ग्राम मिश्री और शीतलचीनी 50 ग्राम, सौंफ 50 ग्राम, सोंठ 50 ग्राम और दालचीनी 50 ग्राम को मिश्री के साथ पीसकर चूर्ण बना लें। इसे तीन से 6 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम सेवन करने से पेट के दर्द में लाभ होता है।
  • जटामांसी, सोंठ, आंवला और काला नमक बराबर की मात्रा में मिलाकर पीस लें और एक-एक चम्मच की मात्रा में 3 बार लें।

शरीर कांपना:

  • हाथ-पैर कांपने पर या किसी दूसरे अंग के अपने आप हिलने पर जटामांसी का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम रोज सेवन करें।
  • 28 से 56 मिलीग्राम जटामांसी के चूर्ण को प्रतिदिन दो तीन बार सेवन करने से शरीर का कंपन दूर हो जाता है।

मासिक-धर्म के विकार:

  • जटामांसी का चूर्ण 20 ग्राम, काला जीरा 10 ग्राम और कालीमिर्च 5 ग्राम मिलाकर चूर्ण बनायें और एक-एक चम्मच दिन में 3 बार कुछ दिन सेवन करें। इससे मासिक-धर्म की पीड़ा, मानसिक तनाव तथा शारीरिक अवसाद दूर होंगे।
  • कष्टपूर्ण मासिकस्राव में जटामांसी का चूर्ण 60 मिलीग्राम से 1.80 ग्राम प्रतिदिन दो-तीन बार सेवन करने से बिना कष्ट के मासिकस्राव खुलकर होने लगता है।

नपुंसकता:

जटामांसी, सोंठ, जायफल और लौंग। सबको समान मात्रा में लेकर पीस लें 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार खायें। इससे नपुंसकता नष्ट हो जाती है।

विसर्प (छोटी-छोटी फुसियों का दल):

  • जटामांसी 600 मिलीग्राम से लेकर 1200 मिलीग्राम को नौसादर के साथ देने से लाभ होता है।
  • जटामांसी की छाल का लेप करने से दर्द कम हो जाता है।

अफारा (गैस का बनना):

जटामांसी 200 ग्राम, मिश्री 400 ग्राम, दालचीनी 50 ग्राम, शीतलचीनी 50 ग्राम, सौंफ 50 ग्राम और 50 ग्राम सोंठ को लेकर मिलाकर रख लें, फिर इसी मिश्रण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में दिन में सुबह और शाम सेवन करने से पेट दर्द समाप्त हो जाता है।

मुंह के छाले:

जटामांसी के टुकड़े मुंह में रखकर चूसते रहने से मुंह की जलन एवं पीड़ा कम होती है।

मुंह की दुर्गन्ध:

  • जटामांसी, कूट, सौंफ, नरकचूर, बड़ी इलायची, सफेद जीरा और बालछड़ 10-10 ग्राम लेकर कूट लें। इस कूट में 70 ग्राम खाण्ड (कच्ची चीनी) मिलाकर रखें। प्रतिदिन सुबह-शाम 5-5 ग्राम मिश्रण पानी के साथ खाने से मुंह की बदबू व मुंह में लार का आना बंद हो जाता है।
  • जटामांसी चबाने से मुंह की दुर्गन्ध नष्ट होती है।

रजोनिवृत्ति (मासिक-धर्म की समाप्ति) के बाद के कष्ट:

रजोनिवृत्ति के समय समय सभी मानसिक और शारीरिक कष्टों को मिटाने के लिए जटामांसी का चूर्ण 600 मिलीग्राम से 1.20 ग्राम प्रतिदिन तीन बार देना चाहिए।

रक्तपित्त:

जटामांसी का चूर्ण 600 मिलीग्राम से 1.20 ग्राम नौसादर के साथ सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त और खून की उल्टी ठीक होती है।

निद्राचारित या नींद में चलना:

लगभग 600 मिलीग्राम से 1.2 ग्राम जटामांसी का सेवन सुबह और शाम को सेवन करने से इस रोग में बहुत लाभ मिलता है।

धनुष्टंकार (टेटनस रोग):

  • शीतलचीनी 10 ग्राम, दालचीनी 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, 40 ग्राम जटामांसी तथा 80 ग्राम मिश्री को मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें। यह चूर्ण 3 से 9 ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से रोगी का रोग दूर हो जाता है।
  • 600 से 1200 मिलीग्राम जटांमासी का चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से टेटनेस के रोगी के शरीर का टेढ़ापन दूर हो जाता है।
  • जटामांसी का काढ़ा बनाकर 280 से 560 मिलीग्राम सुबह-शाम लेने से टेटनेस का रोग ठीक हो जाता है।

उंगुलियों का कांपना:

280 से 560 मिलीग्राम जटामांसी को फेंटकर प्रतिदिन दो से तीन बारी सेवन करने से लाभ मिलता है।