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सरफोंका के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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सरफोंका के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

परिचय (Introduction)

सरफोंका के पौधे सारे हिन्दुस्तान में तथा हिमालय क्षेत्रों में 6 हजार फुट की ऊंचाई पर पायें जाते हैं। फूलो के आधार पर सरफोका के दो भेद होते हैं एक लाल फूल का पौधा और दूसरा सफेद फूल का पौधा है। अक्सर सरफोंका के नाम से लाल या बैंगनी रंग के फूल वाली वनस्पति का ग्रहण एवं प्रयोग किया जाता है। सरफोंका पर फूल बारिश के मौसम में तथा फल सर्दी के मौसम में आते है।

गुण (Property)

यह कफ वातशामक, प्लीहोदर नाशक है। सरफोंका का बाहरी लेप सूजन, कुष्ठ रोग को कम करता है, जहर के असर को दूर करता है।

इसके आंतरिक प्रयोग से पेट की जलन, पित्तसारक, पेट के कीड़े और प्लीहा का बढ़ना दूर होता है। यह रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला) और कफ नि:सारक है। यह मूत्रल और गर्भाशय उत्त्तेजक है। श्वेत सरफोंका अधिक गुणकारी और रसायन है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

बवासीर :
सरफोंका के पत्ते और भांग के पत्तों को बराबर मात्रा में पीसकर उनकी लुग्दी बनाकर, गुदा पर बांधने से खूनी बवासीर मिट जाती है।

दंत रोग :
100 मिलीलीटर सरफोंका की जड़ के काढ़े में 10 ग्राम हरड़ की लुगदी मिलाकर 100 मिलीलीटर तेल में पकायें, जब तेल में से पानी जल जाये तब उसे उतारकर, ठंडा होने पर रूई के फोहे में लगाकर दांत दर्द के लिए प्रयोग करना चाहिए। दांत रोग में इसकी जड़ को पीसकर दर्द वाले दांत के नीचे रखने से भी बहुत लाभ मिलता है।

खांसी :
सरफोंका की सूखी जड़ का धुआं नाक से सूंघने से खांसी में बहुत लाभ होता है।
सरफोंका की जड़ का धूम्रपान करने से खांसी ठीक हो जाती है।

श्वास रोग :
श्वास (सांस) रोग में 2 ग्राम सरफोंका का लवण शहद के साथ दिन में 3 बार चटाने से आराम आता है।

गुल्मरोग :
सरफोंका के क्षार में बराबर मात्रा में हरड़ का चूर्ण मिलाकर 4 ग्राम की मात्रा में भोजन के बाद सुबह-शाम रोगी को देने से गुल्म रोग (पेट मे गैस का गोला बनना) खत्म हो जाता है।

मन्दाग्नि :
10 ग्राम सरफोंका की कड़वी जड़ को 200 मिलीलीटर पानी में उबालकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से मन्दाग्नि (भूख कम लगना) नष्ट हो जाता है।

संग्रहणी :
सरफोंका के 20 मिलीलीटर काढ़े में 2 ग्राम सौंठ मिलाकर सुबह-शाम पीने से संग्रहणी (बार-बार दस्त आना) समाप्त हो रुक जाता है।

अफारा :
10 से 20 मिलीलीटर सरफोंका की जड़ के काढ़े में भूनी हुई 250 से 500 मिलीग्राम हींग को मिलाकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से पेट की गैस खत्म हो जाती है।

उदरशूल :
10 ग्राम सरफोंका की ताजी जड़ की छाल को 2-3 काली मिर्च के साथ पीसकर गोली बनाकर दिन में 3 बार देने से कठोर और ना सहने वाला पेट का दर्द (उदरशूल) मिट जाता है।

अतिसार :
सरफोंका के 5 मिलीलीटर काढ़े में 1-2 लौंग मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से दस्त बंद हो जाते हैं।

विसूचिका (हैजा) :
सरफोंका की जड़ों को पीसकर 2 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीने से हैजे के रोग में लाभ होता है।

मूत्रकृच्छ :
मूत्रकृच्छ (पेशाब करने मे परेशानी) में सरफोंका के 20 से 25 पत्तों को पानी के साथ पीसकर उसमें 3-3 काली मिर्च के दाने मिलाकर रोगी को पिलाने से बहुत लाभ मिलता है।

चर्म रोग :
सरफोंका के बीजों के तेल को कंडू, खुजली आदि चर्म रोगों पर लगाने से लाभ होता है।

जलन :
सरफोंका के 10 से 20 ग्राम बीजों को 1 गिलास ठंडे पानी में भिगोकर, मसलकर और छानकर पीयें तो शरीर की जलन और गर्मी समाप्त हो जायेगी है।

फोड़े-फुंसी :
10 से 20 मिलीलीटर सरफोंका के काढ़े में 2 चम्मच शहद मिलाकर खाली पेट सुबह और शाम पीने से खून साफ होता है और शरीर के फोड़े फुंसी ठीक हो जाते हैं।

दांतों में कीड़े लगना :
सरफोंका के रस में रूई को भिगोकर दांतों के गड्ढ़े में रखें। इससे दांत का दर्द और कीड़े खत्म हो जाते हैं।

यकृत का बढ़ना :
सरफोंका की जड़ का चूर्ण 3-6 ग्राम हरीतकी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। इससे यकृत समान्य हो जाता है।

प्रसव पीड़ा :
सरफोंका की जड़ को गर्भवती महिला की कमर में बांधने से प्रसव के समय होने वाला दर्द कम होता है और बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है।

पेट में दर्द होने पर :
सरफोंका की जड़ की ताजी छाल और काली मिर्च को साथ में पीसकर छोटी-छोटी गोली बनाकर पीने से पेट के दर्द में आराम मिलता हैं।

स्तनों की गांठे (रसूली) :
सरफोंका की जड़ को अच्छी तरह पीसकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों में होने वाली गांठे यानी रसौली समाप्त हो जाती है।

चेहरे के दाग :
सरफोंका के बीजों का लेप करने से या उसके बीजों का तेल लगाने से चेहरे के दाग धब्बे दूर हो जाते हैं और शरीर पर लगाने से खाज-खुजली भी ठीक हो जाती है।

बवासीर :
सरफोंका के पत्ते और भांग के पत्तों को बराबर मात्रा में पीसकर उनकी लुग्दी बनाकर, गुदा पर बांधने से खूनी बवासीर मिट जाती है।

दंत रोग :
100 मिलीलीटर सरफोंका की जड़ के काढ़े में 10 ग्राम हरड़ की लुगदी मिलाकर 100 मिलीलीटर तेल में पकायें, जब तेल में से पानी जल जाये तब उसे उतारकर, ठंडा होने पर रूई के फोहे में लगाकर दांत दर्द के लिए प्रयोग करना चाहिए। दांत रोग में इसकी जड़ को पीसकर दर्द वाले दांत के नीचे रखने से भी बहुत लाभ मिलता है।

खांसी :
सरफोंका की सूखी जड़ का धुआं नाक से सूंघने से खांसी में बहुत लाभ होता है।
सरफोंका की जड़ का धूम्रपान करने से खांसी ठीक हो जाती है।

श्वास रोग :
श्वास (सांस) रोग में 2 ग्राम सरफोंका का लवण शहद के साथ दिन में 3 बार चटाने से आराम आता है।

गुल्मरोग :
सरफोंका के क्षार में बराबर मात्रा में हरड़ का चूर्ण मिलाकर 4 ग्राम की मात्रा में भोजन के बाद सुबह-शाम रोगी को देने से गुल्म रोग (पेट मे गैस का गोला बनना) खत्म हो जाता है।

मन्दाग्नि :
10 ग्राम सरफोंका की कड़वी जड़ को 200 मिलीलीटर पानी में उबालकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से मन्दाग्नि (भूख कम लगना) नष्ट हो जाता है।

संग्रहणी :
सरफोंका के 20 मिलीलीटर काढ़े में 2 ग्राम सौंठ मिलाकर सुबह-शाम पीने से संग्रहणी (बार-बार दस्त आना) समाप्त हो रुक जाता है।

अफारा :
10 से 20 मिलीलीटर सरफोंका की जड़ के काढ़े में भूनी हुई 250 से 500 मिलीग्राम हींग को मिलाकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से पेट की गैस खत्म हो जाती है।

उदरशूल :
10 ग्राम सरफोंका की ताजी जड़ की छाल को 2-3 काली मिर्च के साथ पीसकर गोली बनाकर दिन में 3 बार देने से कठोर और ना सहने वाला पेट का दर्द (उदरशूल) मिट जाता है।

अतिसार :
सरफोंका के 5 मिलीलीटर काढ़े में 1-2 लौंग मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से दस्त बंद हो जाते हैं।

विसूचिका (हैजा) :
सरफोंका की जड़ों को पीसकर 2 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीने से हैजे के रोग में लाभ होता है।

मूत्रकृच्छ :
मूत्रकृच्छ (पेशाब करने मे परेशानी) में सरफोंका के 20 से 25 पत्तों को पानी के साथ पीसकर उसमें 3-3 काली मिर्च के दाने मिलाकर रोगी को पिलाने से बहुत लाभ मिलता है।

चर्म रोग :
सरफोंका के बीजों के तेल को कंडू, खुजली आदि चर्म रोगों पर लगाने से लाभ होता है।

जलन :
सरफोंका के 10 से 20 ग्राम बीजों को 1 गिलास ठंडे पानी में भिगोकर, मसलकर और छानकर पीयें तो शरीर की जलन और गर्मी समाप्त हो जायेगी है।

फोड़े-फुंसी :
10 से 20 मिलीलीटर सरफोंका के काढ़े में 2 चम्मच शहद मिलाकर खाली पेट सुबह और शाम पीने से खून साफ होता है और शरीर के फोड़े फुंसी ठीक हो जाते हैं।

दांतों में कीड़े लगना :
सरफोंका के रस में रूई को भिगोकर दांतों के गड्ढ़े में रखें। इससे दांत का दर्द और कीड़े खत्म हो जाते हैं।

यकृत का बढ़ना :
सरफोंका की जड़ का चूर्ण 3-6 ग्राम हरीतकी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। इससे यकृत समान्य हो जाता है।

प्रसव पीड़ा :
सरफोंका की जड़ को गर्भवती महिला की कमर में बांधने से प्रसव के समय होने वाला दर्द कम होता है और बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है।

पेट में दर्द होने पर :
सरफोंका की जड़ की ताजी छाल और काली मिर्च को साथ में पीसकर छोटी-छोटी गोली बनाकर पीने से पेट के दर्द में आराम मिलता हैं।

स्तनों की गांठे (रसूली) :
सरफोंका की जड़ को अच्छी तरह पीसकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों में होने वाली गांठे यानी रसौली समाप्त हो जाती है।

चेहरे के दाग :
सरफोंका के बीजों का लेप करने से या उसके बीजों का तेल लगाने से चेहरे के दाग धब्बे दूर हो जाते हैं और शरीर पर लगाने से खाज-खुजली भी ठीक हो जाती है।

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