कनेर के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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परिचय (Introduction)

कनेर एक पेड़ है जिसकी ऊंचाई लगभग 15 से 20 फुट होते हैं। इसके पत्ते 4 से 6 इंच लम्बे और 1 इंच चौड़े होते हैं। पत्ते सिरे से नोकदार, नीचे से खुरदरे, सफेद घाटीदार और ऊपर से चिकने होते हैं। कनेर के पेड़ जंगलों और बागों में आसानी से मिल जाते हैं। कनेर के फूल बहुत ही मशहूर हैं और इसके फूल अधिकतर गर्मियों के मौसम ही खिलते हैं। इसकी फलियां चपटी, गोलाकार एवं 5 से 6 इंच लंबी होती है। इसके फल, फूल और जड़ सभी जहरीरे होते हैं। कनेर की चार जातियां होती हैं- सफेद, लाल, गुलाबी और पीला।

औषधि के रूप में सफेद कनेर का प्रयोग ही सबसे अधिक होता है। कनेर के पेड़ को कुरेदने या तोड़ने से एक सफेद द्रव्य निकलता है जिसका प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि कनेर के पेड़ इतने जहरीले होते हैं कि सांप भी इसके आस-पास नहीं आते।

गुण (Property)

कनेर का रस कटु, तीखा, कषैला, लघु, रूखा व गर्म होता है। इसका पका फल कडुवा होता है। यह कुष्ठ, त्वचा रोग, घाव, खुजली, कीड़े, बुखार, पामा, गर्मी, वात रोग, लकवा एवं उपदंश रोग को दूर करता है। इसका प्रयोग कुत्ते के जहर को उतारने और आंखों के रोग दूर करने के लिए भी किया जाता है।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

कनेर एक प्रकार का जहर है जिसे खाने से फेफड़ों को नुकसान हो सकता है। इसके सेवन से हृदय और श्वास की गति रुक सकती है। अत: इसके प्रयोग औषधि के रूप में करते समय बेहद सावधानी रखनी चाहिए।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

सांप, बिच्छू का जहर:

सफेद कनेर की जड़ को घिसकर डंक पर लेप करने या इसके पत्तों का रस पिलाने से सांप या बिच्छू का जहर उतर जाता है।

कुत्ता काट लेने पर:

सफेद कनेर की जड़ की छाल का बारीक चूर्ण बनाकर 60 मिलीग्राम की मात्रा में 4 चम्मच दूध में मिलाकर दिन में 2 बार एक हफ्ते तक रोगी को पिलाएं। इससे कुत्ते का जहर उतर जाता है।

घाव:

कनेर के सूखे हुए पत्तों का चूर्ण बनाकर घाव पर लगाने से घाव जल्द भर जाते हैं।

फोड़े-फुंसियां:

कनेर के लाल फूलों को पीसकर लेप बना लें और यह लेप फोड़े-फुंसियों पर दिन में 2 से 3 बार लगाएं। इससे फोड़े-फुंसियां जल्दी ठीक हो जाते हैं।

दाद:

  • कनेर की जड़ को सिरके में पीसकर दाद पर 2 से 3 बार नियमित लगाने से दाद रोग ठीक होता है।
  • कनेर के पत्ते, आंवला का रस, गंधक, सरसों का तेल और मिट्टी के तेल को मिलाकर मलहम बना लें। इस मलहम को दाद पर लगाने से दाद खत्म होता है।
  • लाल या सफेद फूलों वाली कनेर की जड़ को गाय के पेशाब में घिसकर लगाने से दाद ठीक होता है। इसका लेप बवासीर व कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए भी किया जाता है।

खुजली :

  • कनेर के पत्ते, जड़, फूल व तना बराबर-बराबर मात्रा में लेकर 100 ग्राम की मात्रा बना लें। इस मात्रा को 500 मिलीलीटर सरसों के तेल में पकाएं। जब यह पकते-पकते आधा बच जाए तो इसे छानकर शीशी में भर लें। इसे प्रतिदिन खुजली पर लगाने से खुजली दूर होती है। इसका प्रयोग अनेक प्रकार की त्वचा रोग को दूर करने के लिए भी किया जाता है।
  • कनेर के पत्ते को सरसों तेल में भूनकर खुजली पर मलने से त्वचा की खुजली खत्म होती है।
  • कनेर के पत्ते को 250 मिलीलीटर सफेद तिल के तेल में पकाकर त्वचा पर लगाने से गीली और सूखी दोनो तरह की खुजली दूर होती है।

बवासीर:

  • कनेर और नीम के पत्ते को एक साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को बवासीर के मस्सों पर प्रतिदिन 2 से 3 बार लगाएं। इससे बवासीर के मस्से सूखकर झड़ जाते हैं।
  • कनेर की जड़ को ठंडे पानी के साथ पीसकर दस्त के समय जो अर्श (बवासीर) बाहर निकल आते हैं उन पर लगाएं। इससे बवासीर रोग ठीक होता है।

नंपुसकता:

  • सफेद कनेर की 10 ग्राम जड़ को पीसकर 20 ग्राम वनस्पति घी के साथ पका लें। इस तैयार मलहम को लिंग पर सुबह-शाम लगाने से नुपंसकता दूर होती है।
  • सफेद कनेर की जड़ की छाल को बारीक पीसकर भटकटैया के रस के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को 21 दिनों के अंतर पर लिंग की सुपारी छोड़कर बांकी लिंग पर लेप करने से नपुंसकता खत्म होती है।

अफीम की आदत:

अफीम की आदत छुड़ाने के लिए 100 मिलीग्राम कनेर की जड़ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ कुछ हफ्ते तक नियमित सेवन कराने से अफीम की आदत छूट जाती है।

जोड़ों का दर्द:

लाल कनेर के पत्तों को पीसकर तेल में मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को जोड़ों पर लगाएं। इसे लेप को सुबह-शाम जोड़ों पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।

धातुरोग:

सफेद कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से धातुरोग एवं गर्मी से होने वाले रोग आदि ठीक होता है।

अंडकोष की खुजली:

सफेद या लाल फूल वाली कनेर की जड़ को तेल में पका लें और इस तेल को अंडकोष की खुजली पर लगाएं। इससे अंडकोष की खुजली दूर होती है और फोडे़-फुंसी भी मिट जाते हैं।

अंडकोष की सूजन:

सफेद कनेर के पत्ते को कांजी के साथ पीसकर हल्का गर्म करके अंडकोष पर बांधे। इससे अंडकोष की सूजन दूर होती है।

दांतों का दर्द:

सफेद कनेर की डाल से प्रतिदिन 2 बार दातून करने से दांत का दर्द ठीक होता है और दांत मजबूत होते हैं।

बालों का सफेद होना:

सफेद और लाल कनेर के पत्ते को दूध में पीसकर सिर में लगाने से बालों का सफेद होना (पलित रोग) कम होता है। पीले रंग के फूल वाले कनेर का प्रयोग ज्यादा लाभकारी है।

बालों का गिरना:

कनेर की जड़, दंती व कड़वी तोरई को एक साथ पीसकर केले के रस व तेल के साथ पका लें। इस तैयार लेप को सिर पर लगाने से बालों का गिरना बंद होता है।

दर्द व सूजन:

  • शरीर का कोई भी अंग सूजन जाने पर लाल या सफेद फूल वाले कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर मालिश करें। इससे सूजन में जल्दी आराम मिलता है।
  • सूजन और दर्द को दूर करने के लिए लाल या सफेद फूल वाले कनेर की जड़ को गाय के मूत्र में पीसकर लगाएं। इससे सूजन व दर्द ठीक होता है।

उपदंश (सिफिलिस):

  • लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पानी में घिसकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से लाभ होता है। इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर घाव को धोना भी लाभकारी होता है।
  • सफेद कनेर की जड़ को पानी में पीसकर उपदंश पर लगाने से घाव, सूजन, जलन व दर्द ठीक होता है।

कुष्ठ रोग (सफेद दाग):

  • 200 ग्राम कनेर के पत्ते को एक बाल्टी पानी में उबाल लें और इस उबले पानी से नहाएं। इससे कुष्ठ (कोढ़) के जख्म समाप्त होते हैं।
  • सफेद या लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पीसकर गाय के पेशाब में मिलाकर कुष्ठ (कोढ़) पर लगाने से आराम मिलता है।
  • सफेद कनेर के 100 ग्राम पत्ते को 2 लीटर पानी में उबालें। जब यह उबलते-उबलते 1 लीटर बचा रह जाए तो इसे छानकर एक बाल्टी पानी में मिलाकर नहाएं। प्रतिदिन इस तरह पानी तैयार करके कुछ महीनों तक नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
  • कनेर की जड़ की छाल का रस निकालकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से कोढ़ और अन्य त्वचा रोग समाप्त होते हैं।
  • कनेर की जड़ की छाल को पानी के साथ घिसकर कुष्ठ (कोढ़) के दाग पर लगाने से दाग नष्ट होते हैं।

नासूर (पुराना घाव):

कनेर के पत्ते को छाया में सूखा लें और इसका चूर्ण बनाकर जख्म पर छिड़कें। इससे जख्म ठीक होता है।

फेवस और फंगस रोग:

सफेद या लाल फूल वाले कनेर की जड़ को तेल में पका लें और इस तेल की मालिश रोगग्रस्त अंगों पर करने से फेवस, फंगस की शिकायत दूर होती है। इस तेल का प्रयोग जख्मों की सूजन, कुष्ठ, सूखी खुजली और पपड़ी युक्त रोग आदि में भी किया जाता है।