तुलसी के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

1639

परिचय (Introduction)

तुलसी सभी स्थानों पर पाई जाती है। इसे लोग घरों, बागों व मंदिरों के आस-पास लगाते हैं लेकिन यह जंगलों में अपने आप ही उग आती है। तुलसी की अनेक किस्में होती हैं परन्तु गुण और धर्म की दृष्टि से काली तुलसी सबसे अधिक महत्वपूर्ण व उत्तम होती है। आमतौर पर तुलसी की पत्तियां हरी व काली होती है। तुलसी का पौधा सामान्यत: 1 से 4 फुट तक ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां 1 से 2 इंच लंबे अंडाकार, आयताकार, ग्रंथियुक्त व तीव्र सुगंध वाली होती है। इसमें गोलाकार, बैंगनी या लाल आभा लिए मंजरी (फूल) लगते हैं। तुलसी के पौधे आमतौर पर मार्च-जून में लगाए जाते हैं और सितम्बर-अक्टूबर में पौधे सुगंधित मंजरियों से भर जाते हैं। शीतकाल में इसके फूल आते हैं जो बाद में बीज के रूप में पकते हैं। तुलसी के पौधे में प्रबल विद्युत शक्ति होती है जो उसके चारों तरफ 200 गज तक प्रवाहित होती रहती है। जिसे घर में तुलसी का हरा पौधा होता है उस घर में कभी वज्रपात (आकाश से गिरने वाली बिजली) नहीं होता है।

हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यधिक महत्व दिया गया है। तुलसी की पुजा सभी घरों में की जाती है और इसी लिए तुलसी घर-घर में लगाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस घर में तुलसी के पौधे होते हैं वहां मच्छर, सांप, बिच्छू व हानिकारक कीड़े आदि नहीं उत्पन्न होते।

तुलसी की पत्तियां हाथ जोड़कर या मन में तुलसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा रखते हुए जितनी आवश्यकता हो उतनी ही तोड़नी चाहिए। इसकी पत्तियां तोड़ते समय ध्यान रखें कि मंजरी के आसपास की पत्तियां तोड़ने से पौधा और जल्दी बढ़ता है। अत: मंजरी के पास की पत्तियां ही तोड़ना चाहिए। पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रान्तिकाल, कार्तिक, द्वादशी, रविवार, शाम के समय, रात एवं दिन के बारह बजे के आसपास तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए। तेल की मालिश कराने के बाद बिना नहाए, स्त्रियों के मासिक धर्म के समय अथवा किसी प्रकार की अन्य अशुद्धता के समय तुलसी के पौधे को नहीं छूना चाहिए क्योंकि इससे पौधे जल्दी सूख जाते हैं। यदि पत्तों में छेद दिखाई देने लगे तो कंडे (छाणे) की राख ऊपर छिड़क देने से उत्तम फल मिलता है।

गुण (Property)

आयुर्वेद के अनुसार :आयुर्वेद के अनुसार तुलसी, हल्की, गर्म, तीखी कटु, रूखी, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली होती है।

तुलसी कीडे़ को नष्ट करने वाली, दुर्गंध को दूर करने वाली, कफ को निकालने वाली तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है। यह पसली के दर्द को मिटाने वाली, हृदय के लिए लाभकारी, मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट होना) को ठीक करने वाली, विष के दोषों को नष्ट करने वाली और त्वचा रोग को समाप्त करने वाली होती है। यह हिचकी, खांसी, दमा, सिर दर्द, मिर्गी, पेट के कीड़े, विष विकार, अरुचि (भोजन करने की इच्छा न करना), खून की खराबी, कमर दर्द, मुंह व सांस की बदबू एवं विषम ज्वर आदि को दूर करती है। इससे वीर्य बढ़ता है, उल्टी ठीक होती है, पुराना कब्ज दूर होता है, घाव ठीक होता है, सूजन पचती है, जोड़ों का दर्द, मूत्र की जलन, पेशाब करने में दर्द, कुष्ठ एवं कमजोरी आदि रोग ठीक होता है। यह जीवाणु नष्ट करती है और गर्भ को रोकती है।

यूनानी चिकित्सकों के अनुसार : यूनानी चिकित्सकों के अनुसार तुलसी बल बढ़ाने वाली, हृदयोत्तेजक, सूजन को पचाने वाली एवं सिर दर्द को ठीक करने वाली होती है। तुलसी के पत्ते बेहोशी में सुंघाने से बेहोशी दूर होती है। इसके पत्ते चबाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है। तुलसी के सेवन से सूखी खांसी दूर होती है और वीर्य गाढ़ा होता है। इसके बीज दस्त में आंव व खून आना बंद करता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार : वैज्ञानिकों द्वारा तुलसी का रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसके बीजों में हरे व पीले रंग का एक स्थिर तेल 17.8 प्रतिशत की मात्रा में होता है। इसके अतिरिक्त बीजों से निकलने वाले स्थिर तेल में कुछ सीटोस्टेराल, स्टीयरिक, लिनोलक, पामिटिक, लिनोलेनिक और ओलिक वसा अम्ल भी होते हैं। इसमें ग्लाइकोसाइड, टैनिन, सेवानिन और एल्केलाइड़स भी होते हैं।

तुलसी के पत्ते व मंजरी से लौंग के समान गंधवाले पीले व हरे रंग के उड़नशील तेल 0.1 से 0.3 प्रतिशत की मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें यूजीनाल 71 प्रतिशत, यूजीनाल मिथाइल ईथर 20 प्रतिशत तथा कार्वाकोल 3 प्रतिशत होता है। इसके पत्तों में थोड़ी मात्रा में `केरोटीन` और विटामिन `सी` भी होती है।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

चरक संहिता के अनुसार तुलसी के साथ दूध का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे कुष्ठ रोग होने की संभावना रहती है। कार्तिक के महीने में तुलसी के पत्ते पान के साथ सेवन करने से शारीरिक कष्ट हो सकता है। तुलसी का अधिक मात्रा में सेवन करना मस्तिष्क के लिए हानिकारक होता है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

बुखार और जुकाम :
तुलसी की 65 पत्ते और 8 कालीमिर्च को 250 मिलीलीटर पानी में अच्छी तरह पकाकर छान लें। फिर इसमें दूध व चीनी डालकर चाय की तरह पीएं। इससे बुखार ठीक होता है और जुकाम शांत होता है।
छाया में सुखाई हुई तुलसी की पत्ती 50 ग्राम, बनफ्सा, सौंफ, ब्राहमी बूंटी, लाल चंदन प्रत्येक 30 ग्राम, इलायची व दालचीनी 10-10 ग्राम। इस सभी को कूटकर पानी में मिलाकर चाय बना लें और फिर इसमें दूध व चीनी मिलाकर पीएं। इसके सेवन से सामान्य बुखार, जुकाम और छींके आदि दूर होती है।
तुलसी के 15 पत्ते और 4 कालीमिर्च मिलाकर खाने से जुकाम व बुखार ठीक होता है।

पित्त ज्वर :
पित्त ज्वर से पीड़ित रोगी को यदि अधिक घबराहट हो रही हो तो उसे तुलसी के पत्तों का शर्बत बनाकर पिलाना चाहिए। इससे पित्त ज्वर ठीक होता है।

बुखार (ज्वर) होना :
25 तुलसी के पत्ते, 15 कालीमिर्च, 10 ग्राम अदरक व 10 दालचीनी का 250 मिलीलीटर पानी में उबालकर दिन में 3-4 बार पीने से बुखार ठीक होता है।
20 तुलसी के पत्ते, 20 कालीमिर्च, 9 ग्राम अदरक और 2 ग्राम दालचीनी को 50 मिलीलीटर पानी में पकाकर चाय बना लें। इसमें 25 ग्राम मिश्री या चीनी मिलाकर दिन में 2-3 बार बुखार से पीड़ित रोगी को पिलाएं। इससे सामान्य बुखार दूर होता है।
तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से अधिक पसीना आकर बुखार उतर जाता है।
तुलसी के 8-10 पत्ते, आधा चम्मच लौंग, आधा चम्मच सोंठ का चूर्ण तथा 1 चम्मच कालीमिर्च का चूर्ण। इन सभी को 1 गिलास पानी में उबालें। जब पानी आधा बच जाए तो इसे छानकर थोड़ी-सी चीनी मिलाकर 3-3 चम्मच की मात्रा में दिन में 3-4 बार पिलाने से बुखार का आना ठीक होता जाता है।
तुलसी के 10 पत्ते, सोंठ 3 ग्राम, लौंग 5, कालीमिर्च 21 और स्वादानुसार चीनी डालकर उबालें। जब आधा पानी शेष रह जाए तो इसे छानकर रोगी को 3-4 बार पिलाएं। इससे बुखार में जल्दी आराम मिलता है।

चेचक (बड़ी माता) :
तुलसी के पत्तों के साथ अजवायन को पीसकर प्रतिदिन सेवन करने से चेचक का बुखार शांत होता है।
नीम की नई पत्तियां व तुलसी के पत्ते को मिलाकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण शहद या मिश्री के साथ मिलाकर सुबह के समय रोगी को दें। इससे चेचक के दाने कम होते हैं और जलन शांत होती है।
चेचक के बुखार से पीड़ित रोगी को तुलसी के बीज व धुली हुई अजवाइन को पीसकर रोगी को पिलाना लाभकारी होता है।
सुबह के समय रोगी को तुलसी के पत्तों का रस आधा चम्मच की मात्रा में पिलाने से चेचक के रोग में लाभ मिलता है।

निमोनिया (ठंड लगकर बुखार होना) :
20 तुलसी के पत्ते और 5 कालीमिर्च को पीसकर पानी में मिलाकर पीने से निमोनिया रोग ठीक होता है।
20 तुलसी के पत्ते, 5 कालीमिर्च, 3 लौंग, 2 चुटकी हल्दी और एक गांठ अदरक। इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर एक कप पानी में उबालें और जब आधा कप पानी बच जाए तो इसे छानकर निमोनिया के बुखार से पीड़ित रोगी को पिलाएं। इसका सेवन दिन में 2 बार लगभग 10 दिनों तक करने से निमोनिया रोग ठीक होता है।
तुलसी की पत्तियों का रस, सोंठ, कालीमिर्च तथा पीपल का चूर्ण बनाकर सेवन कराने से निमोनिया में आराम मिलता है।

मियादी बुखार :
तुलसी के 10 पत्ते तथा आधा से 1 ग्राम जावित्री को पीसकर शहद के साथ मिलाकर रोगी को चटाने से मियादी बुखार में आराम मिलता है।
काली तुलसी, वन तुलसी और पोदीना बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें और यह काढ़ा दिन में 3 बार 3 से 7 दिनों मियादी बुखार से पीड़ित रोगी को पिलाएं। इससे बुखार उतर जाता है और रोग में आराम मिलता है।

विषम ज्वर :
तुलसी के पत्तों के रस में कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन कराने से विषम ज्वर में लाभ मिलता है।

शीतला (मसूरिका) ज्वर :
तुलसी के पत्तों का रस और अजवायन को पीसकर शरीर पर लेप करने से दबी हुई चेचक (माता) बाहर आ जाती है।

सन्निपात ज्वर :
तुलसी के ताजे पत्ते 25 ग्राम और कालीमिर्च 1 ग्राम को पानी के साथ पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर छाया में सूखा लें। यह 1-1 गोली पानी के साथ सुबह-शाम सेवन कराने से सान्निपात ज्वर में लाभ मिलता है।

हिचकी :
तुलसी के पत्तों का रस 2 चम्मच और शहद 1 चम्मच मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से हिचकी दूर होती है।

कान का दर्द :
तुलसी के पत्तों के रस को हल्का गर्म करके थोड़ा सा कपूर मिलाकर कान में 2-3 बूंद डालने से कान का दर्द समाप्त होता है।
कान से पीब बहने या कान में दर्द होने पर कुछ दिनों तक लगातार कान में तुलसी के पत्तों का रस गर्म करके डालना चाहिए। इससे कान का दर्द ठीक होता है और पीब का बहना बंद होता है।

कान की सूजन व गांठ :
तुलसी के पत्ते और एरण्ड के ताजे मुलायम पत्ते बराबर मात्रा में मिलाकर पीस लें और फिर इसमें थोड़ा सा नमक मिलाकर कान के पीछे लगाएं। इससे कान की सूजन दूर हो जाती है और गांठे ठीक होती है। इसका उपयोग कनफेडा रोग में भी किया जाता है।

तुलसी का तेल बनाने की विधि :
जड़ सहित पूरा तुलसी का पौधा लेते हैं। फिर इसे धोकर मिट्टी आदि साफ कर लेते हैं। फिर इसे कूटकर आधा किलो पानी और आधा किलो तिल का तेल मिलाकर धीमी-धीमी आंच पर पकाते हैं। पानी जल जाने और तेल शेष रहने पर मलकर छानकर सुरक्षित रख लेते हैं। यही तुलसी का तेल होता है।

बहरापन (कम सुनाई देना) :
तुलसी के पत्तों का रस गर्म करके प्रतिदिन कान में डालने से बहरापन दूर होता है।

कनफेड़ा :
तुलसी के पत्ते, अरण्ड के नए पत्ते और थोड़ा सा नमक एक साथ पीसकर लेप करें। इसका लेप करने से कान की फुन्सियां दूर होती है।

दाद :
तुलसी के पत्तों का रस और नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर दिन में 2 से 3 बार दाद पर लगाने से दाद ठीक होता है। इसके उपयोग से खाज-खुजली, मुंहासे, काले धब्बे, झांई आदि त्वचा के रोग ठीक होते हैं।
दाद से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन तुलसी के पत्तों का रस 12 मिलीलीटर की मात्रा में पीना चाहिए।
तुलसी के पत्तों का रस दाद पर लगाने से दाद ठीक होता है।
तुलसी के 100 पत्ते और चौथाई चम्मच नमक को मिलाकर पीस लें और इसमें आधा नींबू निचोड़कर दाद पर लेप करें। इससे दाद व खाज-खुजली ठीक होती है।
तुलसी के 100 पत्ते और लहसुन की 5 कली को एक साथ पीसकर दाद पर लगाने से दाद ठीक होता है।
दाद को साफ करके तुलसी के पत्ते को पीसकर लेप करने से 15 दिनों में दाद नष्ट हो जाता है।

उल्टी होना :
तुलसी के पत्तों का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर पिलाने से उल्टी बंद होती है।
तुलसी के पत्तों का रस पिलाने से उल्टी बंद हो जाती है। पेट में यदि कीड़े होने के कारण उल्टी आती हो तो उसे तुलसी के पत्तों का रस पिलाना चाहिए।
शहद और तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर चाटने से चक्कर आना व उल्टी बंद होती है।
तुलसी का रस, पोदीना और सौंफ का रस मिलाकर पीने से उल्टी बंद होती है।
10 ग्राम तुलसी के पत्तों को 1 ग्राम छोटी इलायची के साथ पीस लें फिर इसमें 10 ग्राम चीनी मिलाकर सेवन करें। इससे पित्त के कारण होने वाली उल्टी दूर हो जाती है।

दांतों का दर्द :
तुलसी के पत्ते, कालीमिर्च और कपूर को पीसकर दर्द वाले दांतों के बीच दबाकर रखने से दांतों का दर्द ठीक होता है।
कालीमिर्च और तुलसी के पत्तों को पीसकर गोली बना लें और यह गोली दांत के नीचे रखने से दांतों का दर्द नष्ट होता है।
तुलसी के पत्तों का रस पानी में मिलाकर हल्का गर्म करके कुल्ला करें। इससे दांतों का दर्द, मसूढ़ों से खून आना व दांतों के अन्य रोग समाप्त होते हैं।
तुलसी के पत्तों का रस, हल्दी व सेंधानमक मिलाकर पानी में मिला लें और इससे कुल्ले करें। इससे मुंह, दांत तथा गले के सभी विकार दूर होते हैं।

गुहेरी (आंखों की पलकों पर फुंसियां होना) :
आंखों की पलकों पर फुंसियां होने पर तुलसी के पत्ते के रस में लौंग घिसकर लगाएं। इससे फुंसियां समाप्त होती है।

वीर्यवृद्धि (धातु में वृद्धि) :
तुलसी के बीजों का चूर्ण 2 ग्राम की मात्रा में पुराने गुड़ के साथ मिलाकार खाएं और इसके बाद 1 कप दूध पीएं। इसका सेवन नियमित रूप से सुबह-शाम नियमित रूप से कुछ महीनों तक लेने से सेक्स सम्बंधी धातु की वृद्धि होती है। इससे नपुंसकता (नामर्दी) और शीघ्रपतन (धातु का शीघ्र निकल जाना) की समस्याएं दूर हो जाती है।
धातुदुर्बलता (वीर्य की कमजोरी) होने पर तुलसी के बीज 60 ग्राम और मिश्री 75 ग्राम को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण प्रतिदिन 3 ग्राम की मात्रा में गाय के दूध के साथ सेवन करें। इससे धातु की कमजोरी दूर होती है।

स्वप्नदोष (नाईटफाल) :
तुलसी की जड़ का काढ़ा 4-5 चम्मच की मात्रा में रात को सोने से पहले नियमित रूप से कुछ सप्ताह तक पीने से स्वप्नदोष से छुटकारा मिलता है।

शीघ्रपतन (धातु का जल्दी निकल जाना) :
तुलसी की जड़ या बीज चौथाई चम्मच की मात्रा में पानी में रात को भिगोकर रख दें और सुबह उसका सेवन करें। इससे शीघ्रपतन दूर होकर वीर्य पुष्ट (गाढ़ा) होता है।